Vyas

Vyas

Sunday, 30 October 2016

प्रथमे नार्जिता विद्या,
द्वितीये नार्जितं धनम् ।
तृतीये नार्जितं पुण्यम् ,
चतुर्थे किं करिष्यति ।। 
( सुभाषितानि )

जिस मनुष्य ने पहले आश्रम ( ब्रह्मचर्य ) में विद्या नहीं अर्जित किया , दूसरे आश्रम ( गृहस्थ ) में धन नहीं अर्जित किया , तीसरे आश्रम ( वानप्रस्थ ) में पुण्य नहीं अर्जित किया वह मनुष्य चौथे आश्रम ( सन्यास ) में क्या अर्जित करेगा ? 

One who has not earned Vidya in the first Ashrama (Brahmacharya). One who has not earned wealth in second Ashrama (Grihastha). One who has not earned Punya in third Ashrama (Vaanprastha). What will he do in the forth Ashrama (Sanyasa) ?

Tuesday, 25 October 2016

That is knowledge which liberates

तत्कर्म यन्न बन्धाय,
सा विद्या या विमुक्तये ।
अनायासाऽपरं कर्म,
विद्याऽन्या शिल्पनैपुण्यम ॥
।।१-१९-४१॥ 
( विष्णुपुराणे प्रथमस्कन्धे एकोनविंशति अध्याय: ) 

( कर्म वही है जो सीमाओं में बँधा न हो । विद्या वही है जो हमें मुक्ति प्रदान करे । 
शेष सभी कर्म अनायास प्रयास मात्र है । शेष सभी विद्या शिल्प या निपुणता मात्र है ) 

[ That is action which does not promote attachment; that is knowledge which liberates. 
All other action is mere pointless effort; all other knowledge is merely craftsmanship or skill ]

Sunday, 16 October 2016

Great people once begin the work do not leave it despite hit by obstacles.

आरभ्यते नखलु विघ्नभयेन नीचै:,
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमरन्ति मध्या: ।
विघ्ने: पुन: पुनरपि प्रतिहन्यमाना: ,
प्रारभ्य च उत्तमजना न परित्यजन्ति ।।
( पंचतन्त्र ) 

सामान्य लोग विघ्नों के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते हैं । मध्यम लोग कार्य आरम्भ करने के बाद विघ्नों के आने पर रोक देते हैं । किंतु उत्तम लोग बार-बार विघ्नों के बावजूद भी कार्य आरम्भ करने के उपरांत उसे बीच में नहीं छोड़ते हैं । 

Ordinary people do not start the work due to the fear of obstacles. Medium people begin the work but leave them after hit by obstacles. But Great people once they begin the work do not leave it despite hit by obstacles again and again.

Friday, 14 October 2016

Person devoted to work does not care about sorrows and joys.

क्वचित् भूमौ शय्या, क्वचिदपि च पर्यङ्कशयन: ।
क्वचित् शाकाहारी, क्वचिदपि च शाल्योदनरूचि: ।
क्वचित् कन्थाधारी, क्वचिदपि च दिव्याम्बरधर: ।
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दु:खं न च सुखम् ।। 
( सुभाषितानि )

कभी भूमि पर सोना तो कभी पलंग पर शयन करना । कभी शाकभाजी खाना तो कभी सुस्वादु भोजन करना । कभी फटे कपड़े पहनना तो कभी दिव्यवस्त्र धारण करना । कार्य के प्रति समर्पित मनुष्य दुख और सुख के बारे में कभी नहीं सोचते हैं । 

Sometimes sleeps on floor and sleeps on fine bed at other times. Sometimes manages only with vegetables and eats delicious foods at other times. Sometimes wears torn clothes and wears elegant clothes at other times. The person devoted to work does not care about sorrows and joys.

Thursday, 13 October 2016

संस्कृत में शब्दों का प्रयोग

साक्षरा: विपरीताश्चेद् ,

राक्षसा: एव केवलम् ।

सरसो विपरीतश्चेत् ,

सरसत्वम् न मुञ्चति ।।


कृपया ध्यान दें शब्दों का कैसे प्रयोग हुआ है : 

यदि 'साक्षरा:' शब्द को उल्टा कर

दें तो 'राक्षसा:' शब्द बनता है जबकि  'सरस' शब्द को विपरीत करने से भी 'सरस' साथ नहीं छोड़ता । 


Plz pay attention as how words are used:

 If the word 'SAKSHARA' (literate) is inverted it becomes 'RAKSHASA' where as the word 'SARAS' (noble) is inverted it remains as 'SARAS' only.

Tuesday, 16 August 2016

योगक्षेमं वहाम्यहम् ।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ; अध्याय – ९ , श्लोक – २२)

( जो संन्यासी/ ज्ञानी अनन्य भाव से नारायण को आत्म रूप से जानते हुए मेरा निरंतर चिन्तन करते हुए मेरी निष्काम उपासना करते हैं । निरन्तर मुझमें ही स्थित उन परमार्थ ज्ञानियों का योग-क्षेम मैं चलाता हूँ । अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति योग है और प्राप्त वस्तु की रक्षा क्षेम है, उनके ये दोनों कार्य मैं करता हूँ । ) 

शंका :
अन्य भक्तों का योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं ?
यह बात ठीक है, अवश्य भगवान् ही चलाते हैं । किंतु भेद यह है कि जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिए योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा करते हैं, पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिए योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते क्योंकि वे जीने और मरने में भी लोभ नहीं रखते, केवल भगवान ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं । अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं ।

Monday, 11 July 2016

Different people shed their sins in different ways

विद्यातीर्थे जगति विबुधा: साधव: सत्यतीर्थे,
गंगातीर्थे मलिनमनसो योगिनो ध्यानतीर्थे । 
धरातीर्थे धरणिपतयो दानतीर्थे धनाढ्या, 
लज्जातीर्थे कुलयुवतय: पातकं क्षालयन्ते ।। 
( विदुर नीति )

संसार में बुद्धिमान जन विद्यारूपी तीर्थ में, साधु जन सत्यरूपी तीर्थ में, मलिन मन वाले गंगातीर्थ में, योगीजन ध्यानतीर्थ में, नृप जन पृथ्वीतीर्थ में, धनी जन दानतीर्थ में और कुलीन स्त्रियाँ लज्जातीर्थ में अपने पापों को धोते हैं ।

Sunday, 29 May 2016

Crossing River of Desires gives Pure Heart & Contentment

आशानाम नदी मनोरथजला तृष्णा-तरंगाकुला ,
राग-ग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी ।
मोहावर्त सुदुस्तराति गहना प्रोक्तुड़्ग-चिन्तातटी,
तस्या: पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वरा: ।।

वैराग्यशतकम् - भर्तृहरि 

आशा एक नदी है , इच्छाएँ उसका जल है, तृष्णा ( लालसा) इसकी लहरें हैं, राग ( वासना) इसके मगरमच्छ हैं , विभिन्न वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छाएँ  इस पर उड़ने वाले पक्षी हैं , मोह कठिनतापूर्वक पार की जाने वाली गहरी नदी का भँवर है ,  चिन्ताएँ इस नदी के ऊँचे-ऊँचे तट हैं । धैर्य रूपी वृक्ष को यह नदी जड़ से उखाड़ फेंक देती है । जिन महान सन्तों नें इस आशा रूपी नदी को तैर कर पार किया है , वे विशुद्ध मन वाले योगीश्वर प्रसन्न रहते हैं ।

Dream is like a river, wishes are like it's water, ambitions are like it's whirling waves, desires are like crocodiles, eagerness of getting everything are like flying birds over it, greeds are like whirls of this deep river which is extremely difficult to cross, concerns are like high banks of this river, trees of patience are thrown out by this river from their roots. Great saints who have crossed this river of desires, they remain happy throughout with pure heart like yogishwar

Thursday, 19 May 2016

Knowledge and Karma


विद्यां च अविद्यां च य: तद्वेदोभयँ सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाअमृतश्नुते ।। 
।। 11, ईशोपनिषद् ।।

जो विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) इन दोनों को ही एक साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमरत्व प्राप्त कर लेता है ।

He who knows at the same time both Vidya (the Knowledge) and Avidya (the Karma), crosses beyond death by Avidya and obtains Immortality by Vidya.

Note: Here "अविद्या" means "Karma". The man who only does Karma even without having any knowledge of Scriptures. 

Wednesday, 18 May 2016

अनूठा ग्रन्थ कवि वेंकटाध्वरि कृत 'राघवयादवीयम्'

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे । जी हाँ । कांचीपुरम् के 17 वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ राघवयादवीयम् ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा । इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक । पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है 'राघवयादवीयम्' ।  उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक है -

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

( मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी
सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर
 रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापस लौटे )

विलोमम् :

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

( मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है )

राघवयादवीयम के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं

     अथ राघवयादवीयं स्त्रोत्राणि 

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥
विलोमम्
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥
विलोमम्
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥
विलोमम्
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥
विलोमम्
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥
विलोमम्
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥
विलोमम्
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥
विलोमम्
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥
विलोमम्
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥
विलोमम्
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥
विलोमम्
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥
विलोमम्
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥
विलोमम्
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥
विलोमम्
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥
विलोमम्
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥
विलोमम्
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥
विलोमम्
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥
विलोमम्
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥
विलोमम्
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥
विलोमम्
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥
विलोमम्
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।
हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥
विलोमम्
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥
विलोमम्
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥
विलोमम्
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥
विलोमम्
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥
विलोमम्
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥
विलोमम्
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥
विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥
विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥
विलोमम्
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥
विलोमम्
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि सा ।
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्रीराघवयादवीयम्  ।।

कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें की दुनिया में कहीं भी ऐसा नही पाया गया है ।

Sunday, 15 May 2016

Noble men do not become conceited when fortune embraces them but use their wealth to help others.

भवन्ति नम्रा: तरव: फलोद्गमै: ,
नवाम्बुर्भूमि अवलम्बिनो घनाः ।
अनुद्धताः सत्पुरुषा समृद्धिभिः ,
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ।।
( सुभाषितानि )

फलों से लदे हुए वृक्ष नीचे झुक जाते हैं ताकि लोग फलों को पा सकें । जल से भरे हुए बादल भी नीचे आकर वर्षा करके धरती को भिगो देते हैं । इसी प्रकार समृद्धि प्राप्त होने पर सज्जन लोग नम्र हो जाते हैं । क्योंकि परोपकारी लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है । 

Trees laden with fruits bend down so that people may pluck the fruits. Clouds laden with water come down to bring rains cooling the earth and watering plants and trees. In the same way noble men do not become conceited when fortune embraces them but use their wealth to help others. This is the nature of noble people who are always read to help others.

Thursday, 5 May 2016

Foolish man having strong notions can never be appeased.

प्रसह्य मणिम् उद्धरेत मकर-वक्त्र-दंष्ट्रान्तरात् ,
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलत ऊर्मिमालाकुलम् ।
भुजंगमपि कोपितं शिरसि पुष्पवत् धारयेत् ,
न तु प्रतिनिविष्ट मूर्खजनचित्तम् आराधयेत् ।।४।।

नीतिशतकम् - भर्तृहरि 

मनुष्य मगर के मुख के दाँतों के बीच से मणि को बलपूर्वक निकाल सकता है । ऊँची लहरों से आक्रान्त समुद्र को पार कर सकता है । कुपित सर्प को फूल की तरह शिर पर धारण कर सकता है । किन्तु जिसके मन में कोई बात बैठ गई है ऐसे हठी मूर्ख के चित्त को संतुष्ट नहीं कर सकता है ।

One can forcibly take out a jewel from the jaws of crocodile; he can cross the rough sea full of troubled waves; he can even place on his head an irritated snake like a flower; but he cannot appease a foolish man having strong notions. 

Wednesday, 4 May 2016

Man with little knowledge cannot be pleased by Lord Brahma

अज्ञ: सुखमाराध्य: 
सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ: ।
ज्ञानलव दुर्विदग्धं 
ब्रह्माअपि नरं न रंजयति ।।३।।

नीतिशतकम् - भर्तृहरि 

मूर्ख व्यक्ति को शीघ्र ही प्रसन्न किया जा सकता है । विशिष्ट विद्वान को और भी आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है । किन्तु थोड़ा सा ज्ञान पाकर इतराने वाले मनुष्य को स्वयं ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते ।

Ignorant person can easily be pleased. The scholarly man can be pleased more easily. But a man who has become arrogant by obtaining a little knowledge cannot be pleased even by Lord Brahma (the creator).

Noble Sayings getting digested in stomach of the person who speak such sayings.

नीति शतकम् - सुभाषित वचन 

बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: ,
प्रभव: स्मयदूषिता: ।
अबोध उपहस्ताश्चान्ये ,
जीर्णम् अँगे सुभाषितम् ।।२।।

नीतिशतकम् - भर्तृहरि 

सुभाशित वचन को समझने वाले विद्वान द्वेष से भरे हुए हैं । समर्थ राजा अहंकार से चूर हैं । साधारण व्यक्तियों को उसे समझने का ज्ञान नहीं है । इसलिए ये सुभाषित वचन कहने वाले के मुख में ही जीर्ण हो रहे हैं ।

Scholars having knowledge to understand the noble sayings are full of abhorrence; Able rulers are polluted with arrogance; Ordinary people lack capacity to understand noble sayings.Thus, such noble sayings are getting digested in the abdomen of speaker only.

Sunday, 1 May 2016

Whatever is Destined will Definitely Happen

करम गति टारै नाहीं टरी ॥

मुनि वसिष्ठ अस पंडित ज्ञानी,
सोधि के लगन धरी ।
सीता हरन मरन दसरथ कै,
बन में बिपति परी ॥ १ ।।

कहॅं वह फन्द कहाँ वह पारधि,
कहॅं वह मिरग चरी ।
कोटि गाय नित पुन्य करत नृप,
गिरगिट जोनि परी ॥ २॥

पाण्डव जिनके आप सारथी,
तिन पर बिपति परी ।
कहत कबीर सुनो भइ साधो,
होनी  होइ  कै रही ॥ ३॥

करम गति टारै नाहीं टरी ।।

- कबीरदास

Thursday, 25 February 2016

Ideal Kingdom as visualised by Kautilya

कौटिल्य के राजतन्त्र का आदर्श 

प्रजा सुखे सुखं राज्ञ: ,
प्रजानाम् च हिते हितम् ।
न आत्मप्रियं हितं तस्य,
प्रजानाम् तु प्रियं हितम् ।।
( चाणक्य नीति )

[ राजा का अपना सुख कुछ नहीं है । प्रजा का सुख ही राजा का सुख है , प्रजा के हित में ही उसका हित है । राजा का अपना  प्रिय और हित कुछ नहीं है । प्रजा का प्रिय और हित ही उसका प्रिय और हित है ]

Wednesday, 16 December 2015

' राम-राम ' बोल कर अभिवादन करने का महत्व


आपनें कभी सोचा है कि लोग जब मिलते हैं तो आपस में एक दूसरे को दो बार 'राम-राम' बोल कर अभिवादन क्यों करते  हैं ? उत्तर भारत में दो बार 'राम-राम' बोलने की परिपाटी प्राचीन काल से चली आ रही है ।

हिन्दी वर्णमाला 'कटपयादि पद्धति' पर आधारित है । अर्थात अंक वर्णमाला में वर्णों के क्रम से निर्धारित होते हैं ।  इस पद्धति में ‘र' सत्ताईसवाँ  शब्द है । 'आ' की मात्रा दूसरा और ‘म' पच्चीसवाँ शब्द है । अब तीनों अंकों का योग करें तो 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक 'राम' का योग 54 हुआ ।  इसी प्रकार दो  'राम-राम' का कुल योग 108 होता है ।

 ब्रह्माण्ड में व्याप्त भचक्र (zodiac) के 360 डिग्री के चक्र को 27 नक्षत्रों में प्रत्येक में 4 चरण के मान से 108 भागों में बाँटा गया है । प्रत्येक भाग का मान 3 डिग्री 20 मिनट है । इसीलिए जब हम जाप करते हैं तो 108 मनके की माला गिनकर करते हैं, जिससे भचक्र (zodiac) का एक चक्र  पूरा हो जाए ।

मात्र ' राम-राम' कहने से ही पूरी 108 मनके की माला का जाप पूर्ण हो जाता है । 


Tuesday, 13 October 2015

How the things get adorned ?


नागो भाति मदेन कं जलरूहै: पूर्णेन्दुना शर्वरी ।
शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवमन्दिरम् ।।
वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनेन अद्य: सभा पण्डितै: । 
सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोक त्रयं विष्णुना ।।
( काव्य संग्रह )

Tusker with intoxication, Water ponds with lotus, Nights with full moon, Women with their noble behaviour, Horses with speed, Temples with regular festivals, Speech with  grammar, Rivers with pair of swan, Conference with scholars, Dynasty with learned son, Kingdom with noble King and the Universe is adorned with Lord Vishnu. 

गजराज मद से, सरोवर खिले हुए कमलों से, रात्रि पूर्ण चन्द्रमा से, स्त्री शील से, घोड़ा वेग से, मन्दिर नित्य के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदी हंस के जोड़े से, सभा पण्डितों से, कुल सुपुत्र से, पृथ्वी राजा से और तीनों लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं । 

Sunday, 11 October 2015

One should not live at the place where five things are not available

धनिक: श्रोत्रियो राजा,
नदी वैद्यश्च पंचम: । 
पंच यत्र न विद्यन्ते ,
तत्र वासं न कारयेत् ।।
( चाणक्य नीति )

One should not live at the place where the  wealthy persons, Brahmins with knowledge of Scripture, King, Rivers, Physician- these five are not available.


जिस स्थान पर धनवान् , शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य - ये पॉंचों ना रहते हों , वहॉं निवास नहीं करना चाहिए । 

Sunday, 4 October 2015

Human Body lives for short period whereas it's Qualities are known forever

शरीरस्य गुणानाश्च ,
दूरम्अन्त्य अन्तरम् ।
शरीरं क्षणं विध्वंसि ,
कल्पान्त स्थायिनो गुणा: ।।

( चाणक्य नीति )

There is a lot of difference between the human body and its qualities. Because the Human body lives for a short period where as the Qualities are remembered for ever.


शरीर और गुण इन दोनों में बहुत अन्तर है । शरीर थोड़े ही दिनों का मेहमान होता है जबकि गुण प्रलय काल तक बने रहते हैं ।