Vyas

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Sunday, 29 May 2016

Crossing River of Desires gives Pure Heart & Contentment

आशानाम नदी मनोरथजला तृष्णा-तरंगाकुला ,
राग-ग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी ।
मोहावर्त सुदुस्तराति गहना प्रोक्तुड़्ग-चिन्तातटी,
तस्या: पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वरा: ।।

वैराग्यशतकम् - भर्तृहरि 

आशा एक नदी है , इच्छाएँ उसका जल है, तृष्णा ( लालसा) इसकी लहरें हैं, राग ( वासना) इसके मगरमच्छ हैं , विभिन्न वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छाएँ  इस पर उड़ने वाले पक्षी हैं , मोह कठिनतापूर्वक पार की जाने वाली गहरी नदी का भँवर है ,  चिन्ताएँ इस नदी के ऊँचे-ऊँचे तट हैं । धैर्य रूपी वृक्ष को यह नदी जड़ से उखाड़ फेंक देती है । जिन महान सन्तों नें इस आशा रूपी नदी को तैर कर पार किया है , वे विशुद्ध मन वाले योगीश्वर प्रसन्न रहते हैं ।

Dream is like a river, wishes are like it's water, ambitions are like it's whirling waves, desires are like crocodiles, eagerness of getting everything are like flying birds over it, greeds are like whirls of this deep river which is extremely difficult to cross, concerns are like high banks of this river, trees of patience are thrown out by this river from their roots. Great saints who have crossed this river of desires, they remain happy throughout with pure heart like yogishwar

Thursday, 19 May 2016

Knowledge and Karma


विद्यां च अविद्यां च य: तद्वेदोभयँ सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाअमृतश्नुते ।। 
।। 11, ईशोपनिषद् ।।

जो विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) इन दोनों को ही एक साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमरत्व प्राप्त कर लेता है ।

He who knows at the same time both Vidya (the Knowledge) and Avidya (the Karma), crosses beyond death by Avidya and obtains Immortality by Vidya.

Note: Here "अविद्या" means "Karma". The man who only does Karma even without having any knowledge of Scriptures. 

Wednesday, 18 May 2016

अनूठा ग्रन्थ कवि वेंकटाध्वरि कृत 'राघवयादवीयम्'

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे । जी हाँ । कांचीपुरम् के 17 वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ राघवयादवीयम् ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा । इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक । पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है 'राघवयादवीयम्' ।  उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक है -

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

( मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी
सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर
 रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापस लौटे )

विलोमम् :

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

( मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है )

राघवयादवीयम के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं

     अथ राघवयादवीयं स्त्रोत्राणि 

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥
विलोमम्
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥
विलोमम्
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥
विलोमम्
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥
विलोमम्
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥
विलोमम्
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥
विलोमम्
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥
विलोमम्
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥
विलोमम्
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥
विलोमम्
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥
विलोमम्
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥
विलोमम्
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥
विलोमम्
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥
विलोमम्
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥
विलोमम्
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥
विलोमम्
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥
विलोमम्
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥
विलोमम्
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥
विलोमम्
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥
विलोमम्
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥
विलोमम्
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।
हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥
विलोमम्
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥
विलोमम्
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥
विलोमम्
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥
विलोमम्
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥
विलोमम्
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥
विलोमम्
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥
विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥
विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥
विलोमम्
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥
विलोमम्
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि सा ।
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्रीराघवयादवीयम्  ।।

कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें की दुनिया में कहीं भी ऐसा नही पाया गया है ।

Sunday, 15 May 2016

Noble men do not become conceited when fortune embraces them but use their wealth to help others.

भवन्ति नम्रा: तरव: फलोद्गमै: ,
नवाम्बुर्भूमि अवलम्बिनो घनाः ।
अनुद्धताः सत्पुरुषा समृद्धिभिः ,
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ।।
( सुभाषितानि )

फलों से लदे हुए वृक्ष नीचे झुक जाते हैं ताकि लोग फलों को पा सकें । जल से भरे हुए बादल भी नीचे आकर वर्षा करके धरती को भिगो देते हैं । इसी प्रकार समृद्धि प्राप्त होने पर सज्जन लोग नम्र हो जाते हैं । क्योंकि परोपकारी लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है । 

Trees laden with fruits bend down so that people may pluck the fruits. Clouds laden with water come down to bring rains cooling the earth and watering plants and trees. In the same way noble men do not become conceited when fortune embraces them but use their wealth to help others. This is the nature of noble people who are always read to help others.

Thursday, 5 May 2016

Foolish man having strong notions can never be appeased.

प्रसह्य मणिम् उद्धरेत मकर-वक्त्र-दंष्ट्रान्तरात् ,
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलत ऊर्मिमालाकुलम् ।
भुजंगमपि कोपितं शिरसि पुष्पवत् धारयेत् ,
न तु प्रतिनिविष्ट मूर्खजनचित्तम् आराधयेत् ।।४।।

नीतिशतकम् - भर्तृहरि 

मनुष्य मगर के मुख के दाँतों के बीच से मणि को बलपूर्वक निकाल सकता है । ऊँची लहरों से आक्रान्त समुद्र को पार कर सकता है । कुपित सर्प को फूल की तरह शिर पर धारण कर सकता है । किन्तु जिसके मन में कोई बात बैठ गई है ऐसे हठी मूर्ख के चित्त को संतुष्ट नहीं कर सकता है ।

One can forcibly take out a jewel from the jaws of crocodile; he can cross the rough sea full of troubled waves; he can even place on his head an irritated snake like a flower; but he cannot appease a foolish man having strong notions. 

Wednesday, 4 May 2016

Man with little knowledge cannot be pleased by Lord Brahma

अज्ञ: सुखमाराध्य: 
सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ: ।
ज्ञानलव दुर्विदग्धं 
ब्रह्माअपि नरं न रंजयति ।।३।।

नीतिशतकम् - भर्तृहरि 

मूर्ख व्यक्ति को शीघ्र ही प्रसन्न किया जा सकता है । विशिष्ट विद्वान को और भी आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है । किन्तु थोड़ा सा ज्ञान पाकर इतराने वाले मनुष्य को स्वयं ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते ।

Ignorant person can easily be pleased. The scholarly man can be pleased more easily. But a man who has become arrogant by obtaining a little knowledge cannot be pleased even by Lord Brahma (the creator).

Noble Sayings getting digested in stomach of the person who speak such sayings.

नीति शतकम् - सुभाषित वचन 

बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: ,
प्रभव: स्मयदूषिता: ।
अबोध उपहस्ताश्चान्ये ,
जीर्णम् अँगे सुभाषितम् ।।२।।

नीतिशतकम् - भर्तृहरि 

सुभाशित वचन को समझने वाले विद्वान द्वेष से भरे हुए हैं । समर्थ राजा अहंकार से चूर हैं । साधारण व्यक्तियों को उसे समझने का ज्ञान नहीं है । इसलिए ये सुभाषित वचन कहने वाले के मुख में ही जीर्ण हो रहे हैं ।

Scholars having knowledge to understand the noble sayings are full of abhorrence; Able rulers are polluted with arrogance; Ordinary people lack capacity to understand noble sayings.Thus, such noble sayings are getting digested in the abdomen of speaker only.

Sunday, 1 May 2016

Whatever is Destined will Definitely Happen

करम गति टारै नाहीं टरी ॥

मुनि वसिष्ठ अस पंडित ज्ञानी,
सोधि के लगन धरी ।
सीता हरन मरन दसरथ कै,
बन में बिपति परी ॥ १ ।।

कहॅं वह फन्द कहाँ वह पारधि,
कहॅं वह मिरग चरी ।
कोटि गाय नित पुन्य करत नृप,
गिरगिट जोनि परी ॥ २॥

पाण्डव जिनके आप सारथी,
तिन पर बिपति परी ।
कहत कबीर सुनो भइ साधो,
होनी  होइ  कै रही ॥ ३॥

करम गति टारै नाहीं टरी ।।

- कबीरदास

Thursday, 25 February 2016

Ideal Kingdom as visualised by Kautilya

कौटिल्य के राजतन्त्र का आदर्श 

प्रजा सुखे सुखं राज्ञ: ,
प्रजानाम् च हिते हितम् ।
न आत्मप्रियं हितं तस्य,
प्रजानाम् तु प्रियं हितम् ।।
( चाणक्य नीति )

[ राजा का अपना सुख कुछ नहीं है । प्रजा का सुख ही राजा का सुख है , प्रजा के हित में ही उसका हित है । राजा का अपना  प्रिय और हित कुछ नहीं है । प्रजा का प्रिय और हित ही उसका प्रिय और हित है ]

Wednesday, 16 December 2015

' राम-राम ' बोल कर अभिवादन करने का महत्व


आपनें कभी सोचा है कि लोग जब मिलते हैं तो आपस में एक दूसरे को दो बार 'राम-राम' बोल कर अभिवादन क्यों करते  हैं ? उत्तर भारत में दो बार 'राम-राम' बोलने की परिपाटी प्राचीन काल से चली आ रही है ।

हिन्दी वर्णमाला 'कटपयादि पद्धति' पर आधारित है । अर्थात अंक वर्णमाला में वर्णों के क्रम से निर्धारित होते हैं ।  इस पद्धति में ‘र' सत्ताईसवाँ  शब्द है । 'आ' की मात्रा दूसरा और ‘म' पच्चीसवाँ शब्द है । अब तीनों अंकों का योग करें तो 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक 'राम' का योग 54 हुआ ।  इसी प्रकार दो  'राम-राम' का कुल योग 108 होता है ।

 ब्रह्माण्ड में व्याप्त भचक्र (zodiac) के 360 डिग्री के चक्र को 27 नक्षत्रों में प्रत्येक में 4 चरण के मान से 108 भागों में बाँटा गया है । प्रत्येक भाग का मान 3 डिग्री 20 मिनट है । इसीलिए जब हम जाप करते हैं तो 108 मनके की माला गिनकर करते हैं, जिससे भचक्र (zodiac) का एक चक्र  पूरा हो जाए ।

मात्र ' राम-राम' कहने से ही पूरी 108 मनके की माला का जाप पूर्ण हो जाता है । 


Tuesday, 13 October 2015

How the things get adorned ?


नागो भाति मदेन कं जलरूहै: पूर्णेन्दुना शर्वरी ।
शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवमन्दिरम् ।।
वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनेन अद्य: सभा पण्डितै: । 
सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोक त्रयं विष्णुना ।।
( काव्य संग्रह )

Tusker with intoxication, Water ponds with lotus, Nights with full moon, Women with their noble behaviour, Horses with speed, Temples with regular festivals, Speech with  grammar, Rivers with pair of swan, Conference with scholars, Dynasty with learned son, Kingdom with noble King and the Universe is adorned with Lord Vishnu. 

गजराज मद से, सरोवर खिले हुए कमलों से, रात्रि पूर्ण चन्द्रमा से, स्त्री शील से, घोड़ा वेग से, मन्दिर नित्य के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदी हंस के जोड़े से, सभा पण्डितों से, कुल सुपुत्र से, पृथ्वी राजा से और तीनों लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं । 

Sunday, 11 October 2015

One should not live at the place where five things are not available

धनिक: श्रोत्रियो राजा,
नदी वैद्यश्च पंचम: । 
पंच यत्र न विद्यन्ते ,
तत्र वासं न कारयेत् ।।
( चाणक्य नीति )

One should not live at the place where the  wealthy persons, Brahmins with knowledge of Scripture, King, Rivers, Physician- these five are not available.


जिस स्थान पर धनवान् , शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य - ये पॉंचों ना रहते हों , वहॉं निवास नहीं करना चाहिए । 

Sunday, 4 October 2015

Human Body lives for short period whereas it's Qualities are known forever

शरीरस्य गुणानाश्च ,
दूरम्अन्त्य अन्तरम् ।
शरीरं क्षणं विध्वंसि ,
कल्पान्त स्थायिनो गुणा: ।।

( चाणक्य नीति )

There is a lot of difference between the human body and its qualities. Because the Human body lives for a short period where as the Qualities are remembered for ever.


शरीर और गुण इन दोनों में बहुत अन्तर है । शरीर थोड़े ही दिनों का मेहमान होता है जबकि गुण प्रलय काल तक बने रहते हैं ।

Friday, 2 October 2015

Even a moment of our life is more precious than thousands of gold coins

आयुष: क्षण एकोअपि ,
न लभ्य: स्वर्ण कोटिभि: । 
स चेत् निरर्थकं नीत: ,
का नु हानि: ततो अधिका ।।

( चाणक्य नीति )

Even a precious moment of our Life cannot be purchased by thousands of gold coins. If one moment is wasted, what would be more loss compared to this ?

जीवन का एक क्षण भी कोटि स्वर्णमुद्रा देने पर भी नहीं मिल सकता । वह यदि नष्ट हो जाय तो इससे अधिक हानि क्या हो सकती है ? 

Tuesday, 29 September 2015

Noble persons who help others, do not face adversity & sorrow

परोपकरणं येषाम् ,
जागर्ति हृदये सताम् ।
नश्यन्ति विपद: तेषाम् ,
सम्पद: स्यु: पदे पदे ।।
( विदुर नीति )

For noble persons in whose heart arise the thoughts of helping others;  there is no adversity and sorrow. The prosperity and happiness embrace them at every step.

जिन सहृदय लोगों के हृदय में परोपकार करने की भावना सदैव जागृत रहती है ; उन्हें  दुख और विपत्ति कभी नहीं सताती है ; बल्कि  उन्हें  पग-पग पर समृद्धि और खुशी प्राप्त होती है । 

Saturday, 26 September 2015

The 'Giver' always roar like clouds.

संग्रहैकपरः प्रायः ,
समुद्रोपि रसातले ।
दातारं जलधं पश्य,
गर्जन्तं भुवनोपरि ।।

( चाणक्य नीति )

The 'Hoarder' is always at the lower footing like the Sea. Look at the 'Giver' Clouds which always roar over the earth. 

'संग्राहक'  समुद्र  की तरह सदैव रसातल में ही रहता है । 'दानी'  बादल को देखिए जो पृथ्वी के ऊपर सदैव गरजते रहते हैं । 

Sunday, 20 September 2015

Virtuous person always bow down to earth

नमन्ति फलिनो वृक्षा: ,
नमन्ति गुणिनो जनाः ।
शुष्क काष्ठश्च मूर्खश्च,
न नमन्ति कदाचन् ।।
( चाणक्य नीति )

Branch of a tree with lot of fruits bends towards earth. Virtuous person always bow down to earth. But a dry wood never bends down. Neither does a fool who does not respect others. 


फलों से लदे हुए वृक्ष भूमि की ओर झुक जाते हैं । गुणी लोग भी सदैव झुक जाते हैं । किन्तु सूखी लकड़ी और मूर्ख लोग कभी झुकते नहीं हैं ।

Those who aspire to get wealth & fame should leave six things

षड् दोषा: पुरूषेण इह,
हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध:,
आलस्यं दीर्घसूत्रता ।।
( विदुर नीति )

Those who aspire to get wealth and fame should leave these six things - Sleep, Lassitude, Fear, Anger, Laziness and Procrastination.

ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरूषों को - निद्रा, तन्द्रा , डर, क्रोध , आलस्य एवं दीर्घसूत्रता - ये छ: दुर्गुण छोड़ देना चाहिए ।

Wherever you go five types of people will follow

पंच त्वाम् अनुगमिष्यन्ति,
यत्र यत्र गमिष्यसि ।
मित्रान् अमित्रा मध्यस्था,
उपजीव्यो अपजीविन: ।।
( विदुर नीति )

O King ! Wherever you will go, these five types of people will follow you - Friends , Enemy, Sages , Shelter givers  and Those who decline shelter. 

हे राजन् !  आप जहाँ-जहाँ जाएँगे वहाँ-वहाँ ये पाँच तरह के व्यक्ति आपका अनुगमन करेंगे -  मित्र , शत्रु , उदासीन, आश्रय देने वाले और आश्रय पाने वाले ।

Who worship five types of persons attain glory

पंचैव पूजयेत् इह लोके,
यश: प्राप्नोति केवलम् ।
देवान् पितृन् मनुष्यांश्च,
भिक्षून अतिथि पंचमान् ।।
( विदुर नीति )

Gods, Forefathers, Noble Persons, Saint  and Guests- Those who worship them in this world attain glory.

देवता, पितर, मनुष्य, सन्यासी और अतिथि - संसार में इन पाँचों की पूजा करने वाला व्यक्ति यश प्राप्त करता है ।