उद्यमेन हि सिद्धयन्ति,
कार्याणि हि मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य ,
प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।।
( पंचतंत्र-मित्रसम्प्राप्ति )
Any desire doesn't get accomplished merely by aspiring for it. A ‘prey’ itself doesn't fall into the mouth of a sleeping Lion.
कोई कार्य उद्यम करने से पूर्ण होता है न कि मात्र इच्छा करने से । जैसे सोए हुए शेर के मुँह में मृग का शिकार स्वयं नहीँ पहुँच जाता ।
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